नेगी दा : देश-दुनिया में उत्तराखंड के लोकजीवन-लोक संस्कृति की ‘प्रतिनिधि आवाज़’
देहरादून। 80 और 90 के दशक का पहाड़…। तब मोबाइल, यू-ट्यूब, व्हॉट्सएप कल्पना से परे था। लैंडलाइन की घंटी भी डाकघरों और सरकारी दफ्तरों में ही घनघनाती थी। मनोरंजन के साधन सिनेमाघर और टेलीविजन ही थे। वे भी पहाड़ी गांवों-कस्बों और आम घरों से दूर-बहुत दूर थे। पहाड़ी लोकजीवन में पहाड़ सी चुनौतियां थीं। मांओं-बहनों, बेटी-ब्वारियों का जीवन तो और भी दुश्वारियों भरा था। सूरज की पहली किरण से भी पहले घास-लकड़ी, चौका-चूल्हा से लेकर खेतों की चिंता के साथ शुरू उनका दिन रूमुक पड़ते सिर पर पानी का बंठा व पीठ पर घास-लकड़ी के भारे लादे घर-आंगन में कदम रखने और उससे भी आगे फिर चौका-चूल्हा तक अनवरत परिश्रम में बीतता। बूढ़े मां-बाप की आंखों में सुदूर महानगरों में दो जून की रोटी के संघर्ष में थपेड़े खाते बेटे की चिंता तैरती, तो पत्नियां अपने पति की पाती की उम्मीद में डाकिए का इंतजार करतीं। मायके की खुद लगती तो कभी घने जंगलों-ऊंचे पहाड़ों की दुरूह पगड़ंडी और कभी बादलों की गड़गड़ाहट-बारिश की झड़ी भयभीत करती। चौतरफा कठिनाइयों से जूझते पहाड़ और पहाड़ी लोकजीवन को तब एक आवाज मिली…। आकाशवाणी (एआईआर) और कैसेट प्लेयर से गूंजती वह आवाज, जिसने पहाड़ के हर व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन को अभिव्यक्त किया। वह आवाज, जो पिछले 50-52 सालों से देश-दुनिया के बीच सही मायनों में उत्तराखंड के लोकजीवन और लोक संस्कृति की ‘प्रतिनिधि आवाज’ बनी है। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के शीर्ष लोकगायक, गीतकार, संगीतकार और जन-संघर्षों के पुरोधा नरेंद्र सिंह नेगी की।
नेगीदा आज 12 अगस्त को 77 बसंत पार कर किए हैं। 12 अगस्त 1949 को पौड़ी में जन्में नरेंद्र सिंह नेगी ने पिछले तकरीबन 52 वर्षों से शब्द सृजन और सुर की संगीतमय सरिता लोक में प्रवाह्ति कर रहे हैं। 1974 में कागज के कुछ टुकड़ों पर मन के काव्यात्मक भावों को गीत का आकार देने के लिए लिखकर सहेज लेने के साथ शुरू उनका सफर एक बार शुरू हुआ, तो उन्हें सुनकर पूरा पहाड़ ही उनका होकर रह गया। नेगीदा के गीत इसलिए भी बेहद ‘खास’ हुए हैं, क्योंकि उनके तकरीबन हर गीत में ‘आम’ को ही जगह मिली। आमजन की पीड़ा को, उसकी खुशियों को उन्होंने लिखा और गाया। पहाड़ और पहाड़ी जन-जीवन को एक भी पहलू ऐसा नहीं है, तो नेगीदा के गीतों में अभिव्यक्त होने से छूट गया हो।
नेगीदा जब तड़के से सांझ ढलने तक सूरज की गति और पहाड़ के पूरे एक दिन के साथ प्रकृति-पक्षियों और बेटी-ब्वारियों की दिनचर्या की जुगलबंदी को शब्दाकार देते हैं तो लोक में गूंजते हैं, ‘चम्म चमकी घाम कांठ्यूं मा-हिंवाली कांठी चांदी की बणि गैनी…’ और ‘डांडा धारू मा-घाम अछिगे-पौंछि कै दूर मुलुक-पड़ि रूमुक…।’ आज से दो-ढाई दषक पहले तक के पहाड़ की डराने वाली सन्नाटे भरी रात में पति विरह में ‘खुद’ से व्याकुल मन की पीड़ा को वे जब व्यक्त करते हैं तो मिलता है भावुक कर देने वाला गीत, ‘डौर लगदी जब कखी निन्यारु बासदु, सारु मिलदु जब कखी क्वी दानु खांसदु…अब त सी बिचारा भी स्येगैनी नींद मा., मी यखुली बिजियुं छौं…यखुली-यखुली बिजियों छौं…तुम्हारी खुद मा….।’
विवाह के बाद बेटे-बहू का अपनी सुख-सुविधा के लिए घर-गांव में बूढ़े माता-पिता को अकेला छोड़ कर चले जाने का दर्द शब्दों में पिरोकर वे समाज को झकझोरते हैं। एक बानगी….‘कनु लड़िक बिगड़ी म्यारू-ब्वारि कैरी की…कै मा लगाण छुईं अपणि खैरी की…। नेगीदा ने जीवन के हर पहलू को आवाज दी है। पहाड़ में बसों के सफर के दौरान मचने वाली ‘कुरचमकुरचा’ की तस्वीर वे मस्तीभरे अंदाज में बखूबी उकेरते हैं, ‘ सरारर…पौं-पौं, चली भै मोटर चली-ऊंचा निचा डांडों मा-टेडा मेढा बाटौं मा…।’ उन्होंने प्रेम के अद्वितीय एहसास को भी बेहतरीन ढंग से कई गीतों में उतारा है। मसलन, ‘माछी-पाणी सी ज्यू तेरू-मेरू हो… बिना तेरा नी रयैंदू-नी रयैंदू त्वे बिना…।’ वे वसंत ऋतु में पहाड़ के सौंदर्य को जब गीतों में उतारते हैं तो मिलता है, ‘मेरा डांडी कांठ्यों का मुलुक एैलू-बसंत ऋतु मा ऐई…’ जैसा मोहक गीत।
नेगीदा जन से जुड़े संघर्षों में भी कभी पीछे नहीं रहे। 1990 के दषक में जब उत्तराखंड आंदोलन अपने चरम पर था, तो उनका गीत जन-जन की जुबां पर रहा, ‘बोला कख जाणा छा तुम लोग…उत्तराखंड आंदोलन मा…।’ जब उत्तर प्रदेष की मुलायम-माया सरकार ने उत्तराखंड आंदोलनकारियों का दमन किया, तो उन्होंने उत्तर प्रदेष में सरकारी नौकरी की परवाह न करते हुए जुल्मी सरकार को सीधे चुनौती देता गीत रच डाला, ‘तेरा जुल्म को हिसाब ल्योला एक दिन…लाठी-गोली कू जवाब देला एक दिन…वे दिन औंण तक अलख जगिं राली ये उत्तराखंड मा-लड़ै लगिं राली ये उत्तराखंड मा…।’ राज्य बना और पहली निर्वाचित सरकार ने जन-आकांक्षाओं के विपरीत काम किया, तो उत्तरांचल सरकार के अधिकारी होते हुए भी नेगीदा ने गाया वह ऐतिहासिक गीत ‘नौछमी नारैणा…,’ जिसने देष ही नहीं, देष से बाहर भी उन्हें लोकप्रियता की और ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यकीनन, यह गीत उस वक्त सत्ता परिर्वन का गीत बना। पलायन की पीड़ा पर अनेक गीत रचने-गाने वाले नरेंद्र सिंह नेगी ने टिहरी डूबने से भी कई साल पहले रचा था वह कालजयी गीत, जो अपनी जड़ों से बिछुड़े लोगों की आंखों में आज भी आंसू ला देता है, ‘अबारि दां तू लंबी छुट्टी ले के एई-ऐ गै बगत आखिर, टिरी डुबण लग्यूं च बेटा-डाम का खातिर….।’
यह विडंबना ही कही जाएगी कि उत्तराखंड बनने के बाद यहां के हिस्से अनेक पद्म सम्मान आए हैं। कई ऐसे लोग भी यह सम्मान पा चुके हैं, जिनकी पात्रता नेगीदा के मुकाबले कोसो दूर तक भी नहीं ठहरती। बावजूद इसके, आज तक नरेंद्र सिंह नेगी पद्म सम्मान से दूर रखे गए हैं। यह उनके सम्मान में मंचों पर कसीदे पढ़ने वाली उत्तराखंड की सरकार और यहां के जन-प्रतिनिधियों की घोर नाकामी है, क्योंकि वे इस दिशा में केंद्र तक पहल नहीं पाए हैं। निःसंदेह यदि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और प्रदेष की पुष्कर सिंह धामी सरकार उत्तराखंड की जनभावनाओं और यहां के लोक का सम्मान करती हैं, तो उन्हें नेगीदा को पद्मश्री और पद्मभूषण नहीं, उनके कद के अनुरूप कम से कम पद्मविभूषण से अलंकृत करने की पहल करनी ही चाहिए।

