हीरा सिंह बिष्ट : संघर्ष से शिखर तक का सफर तय कर अनंत में विलीन हुई दूनघाटी की प्रखर आवाज
देहरादून। यह 70 का दशक था। दूनघाटी बाहरी छात्र गुटों की दबंगई से खौफजदा थी। ऐसे दौर में उस खौफ को खत्म करके स्थानीय लोगों का दबदबा कायम करने में जिन कुछ छात्र-युवा नेताओं ने अहम भूमिका निभाई, उनमें एक प्रमुख नाम था हीरा सिंह बिष्ट। रविवार को वे पंचतत्व में विलीन हो गए। हीरा सिंह बिष्ट के पांच दशक से भी लंबे राजनीतिक जीवन में उनके माध्यम से उस पुराने दून से लेकर इस ढाई दशक के प्रदेश को काफी कुछ मिला। फिर चाहे वह उत्तराखंड का परिवहन निगम और आईएसबीटी हो या रायपुर का क्रिकेट स्टेडियम, वॉल्वो बसों की आरामदायक सवारी हो या उत्तराखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी (यूटीयू)। यही नहीं, उत्तराखंड में क्रिकेट को बीसीसीआई से मान्यता दिलाने के संघर्ष में भी उनकी अहम भूमिका रही। कम लोग ही जानते हैं कि एनडी तिवारी सरकार में आए भू-कानून के रास्ते में मंत्रिमंडल के भीतर ही मतभिन्नताओं के कारण उत्पन्न बाधाएं खत्म कराने के लिए भी वे खूब भिड़े। इस सब से भी ऊपर उनकी सबसे बड़ी पहचान सादगी, बेदाग राजनीतिक जीवन और पार्टी व सिद्धांतों के प्रति निष्ठा रही है।
बाहरी छात्र गुटों की दबंगई और खौफ को खत्म करने में निभाई भूमिका, जीवनभर कांग्रेसी बनकर रहे
हीरा सिंह बिष्ट की राजनीति की शुरूआत छात्रजीवन से ही हो गई थी। साल 1972-73 और 1973-74 में वे दो बार डीएवी कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। उनके साथ छात्रसंघ में उपाध्यक्ष और महासचिव रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि यह वह दौर था, जब डीएवी देहरादून और उत्तराखंड ही नहीं आसपास के राज्यों में भी षिक्षा के एक बड़े केंद्र के तौर पर विख्यात था। इसके चलते बड़ी संख्या में अन्य जिलों व राज्यों से भी छात्र यहां पढ़ने आते थे। एक समय ऐसा आया, जब बाहरी छात्र गुटों के वर्चस्व के कारण छोटी सी दूनघाटी का माहौल बिगड़ने लगा। तब हीरा सिंह बिष्ट और उन समेत कुछ छात्र नेताओं ने जूझते हुए उस माहौल को बदला। वे बताते हैं कि बिष्ट कई बार के विधायक व यूपी सरकार में मंत्री रहे शांतिप्रपन्न शर्मा के माध्यम से कांग्रेस में आए। एक बार कांग्रेस का हिस्सा बनने के बाद वे ताउम्र उसी के होकर रहे।
ग्राम प्रधान से लेकर तीन बार के विधायक और कैबिनेट मंत्री तक का तय किया सफर, वकालत भी की
हीरा सिंह बिष्ट तपोवन-नालापानी के ग्राम प्रधान भी रहे। वे देहरादून कचहरी में भी शुरूआती दौर में बतौर अधिवक्ता सक्रिय रहे। 1980 की शुरूआत में डोईवाला से अलग करके रायपुर को ब्लॉक बनाया गया, तो वे इसके पहले ब्लॉक प्रमुख भी चुने गए। कांग्रेस संगठन में युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहने के अलावा वे देहरादून कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे। 1985 में अविभाजित उत्तर प्रदेष विधानसभा के लिए देहरादून नगर सीट से भाजपा के हरबंस कपूर को हराकर वे विधायक चुने गए। वे दो बार टिहरी लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी भी रहे। वे साल-2002 में उत्तराखंड की पहली निर्वाचित विधानसभा में राजपुर रोड सीट से भाजपा के खुशहाल सिंह रणावत को हराकर विधायक चुने गए। उन्हें एनडी तिवारी सरकार में परिवहन, श्रम एवं तकनीकी शिक्षा समेत भारी-भरकम मंत्रालय सौंपे गए, जहां उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। वे 2014 में डोईवाला सीट से उपचुनाव जीतकर भी विधानसभा में पहुंचे। हालांकि, साल-2017 में डोईवाला और 2022 में रायपुर से उन्हें सफलता नहीं मिल पाई।
परिवहन निगम का गठन, आईएसबीटी निर्माण और पहली वॉल्वों का कराया संचालन
विधायक और मंत्री के तौर पर हीरा सिंह बिष्ट के खाते में कई अहम कार्य और उपलब्धियां हैं। राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में सरकारी परिवहन का स्वरूप क्या हो, इसे लेकर करीब तीन साल लंबी जद्दोजहद चली। खासकर, यूपी से रोडवेज की परिसंपत्तियों के बंटवारे पर पेच उलझा हुआ था। साल-2002 में परिवहन मंत्री बनते ही बिष्ट ने इस दिशा में प्रयास शुरू किए और साल-2003 में उत्तराखंड के लिए अलग परिवहन निगम का गठन कराया। उन्हीं के परिवहन मंत्री रहते माजरा में बीओटी पैटर्न (बिल्ट, ऑपरेट एंड ट्रांसफर) आधारित देष के पहले आईएसबीटी का निर्माण हुआ। यही नहीं, साल-2004 में देहरादून से दिल्ली के लिए पहली वॉल्वो बस को परिवहन निगम के बेड़े में शामिल करते हुए उन्होंने संचालन शुरू कराया। परिवहन निगम के पुराने-जर्जरहाल बस बेड़े को भी पूरी तरह बदलवाया।
तकनीकी विश्वविद्यालय की स्थापना, पॉलिटेक्नीक का विस्तार और क्रिकेट के लिए दिया अहम योगदान
प्राविधिक एवं तकनीकी षिक्षा मंत्री की हैसियत से उन्होंने प्रदेष की पहली सरकार में कई पॉलिटेक्नीक व आईटीआई की स्थापना कराई। यही नहीं, उत्तराखंड तकनीकी विष्वविद्यालय की स्थापना भी साल-2005 में उन्हीं के मंत्रित्वकाल में हुई। बिष्ट का योगदान अपने रायपुर क्षेत्र में क्रिकेट स्टेडियम के लिए अविभाजित यूपी के समय ही जमीन आवंटित कराने के लेकर कांग्रेस सरकार के समय स्टेडियम निर्माण और नवोदय विद्यालय की स्थापना के मामले में भी याद किया जाता है। आज उत्तराखंड क्रिकेट के क्षेत्र में पहचान बना रहा है, लेकिन राज्य को बीसीसीआई से क्रिकेट के लिए मान्यता दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। तिवारी सरकार में रहते आईटी पार्क को अपने क्षेत्र में स्थापित कराने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भू-कानून के पक्ष में सरकार के भीतर की मजबूत पैरवी, दूनघाटी का पुराना स्वरूप बचाने के लिए भी जूझे
बिष्ट उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी प्रमुखता से सक्रिय रहे। यही नहीं, तिवारी सरकार में आए भू-कानून के लिए भी उन्होंने अहम योगदान दिया। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच के महामंत्री रामलाल खंडूरी बताते हैं कि जब भू-कानून लाया जा रहा था, तो तिवारी मंत्रिमंडल के भीतर ही उसे लेकर दो खेेमें बन गए थे। कुछेक मंत्री इसका विरोध कर रहे थे, जिनके साथ बिष्ट की भिड़ंत हो गई। अंदरखाने जब इसकी जानकारी मंच तक पहुंची, तो भू-कानून को ठंडे बस्ते में जाने से रोकने के लिए मंच की अगुआई में आंदोलनकारी सड़कों पर उतरे। इससे बिष्ट समेत मंत्रिमंडल में भू-कानून के पक्षधर खेमे को मजबूती मिली। हीरा सिंह बिष्ट दूनघाटी के पुराने स्वरूप को बरकरार रखे जाने के प्रबल पक्षधर थे। वे एमडीडीए के भी सदस्य रहे। जब एमडीडीए ने राजपुर रोड पर भवनों की ऊंचाई बढ़ाने का प्रयास किया, तो बिष्ट ने बोर्ड बैठक में उसका प्रभावी ढंग से विरोध करते हुए ऐसा नहीं होने दिया। उनका कहना था कि राजपुर रोड पर अगर दो मंजिल और डालनवाला समेत अन्य क्षेत्रों में तीन मंजिल से ज्यादा की अनुमति दी गई, तो इस खूबसूरत घाटी का स्वरूप बर्बाद हो जाएगा। हालांकि, उनके एमडीडीए बोर्ड से हटने के बाद बेतरतीब निर्माणों की बाढ़ आ गई और दूनघाटी का पुराना स्वरूप बहुमंजिला इमारतों के बीच नष्ट-भ्रष्ट हो गया। अलग-अलग कालखंड में इंटक के नगर से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक के दायित्व को संभालने के साथ ही उन्होंने श्रमिकों के हितों के लिए व्यापक तौर पर संघर्ष किया। यहां तक कि जब ओएनजीसी को देहरादून से शिफ्ट करने की बात चली, तो उन्होंने इसके विरूद्ध भी आंदोलन की अगुआई की और ऐसा नहीं होने दिया। वे अखिल गढ़वाल सभा के संरक्षक मंडल के सदस्य भी थे।
सीएम-सीएस और सांसद समेत बड़ी संख्या में लोगों ने दी अंतिम विदाई
पूर्व मंत्री बिष्ट का पार्थिव शरीर रविवार दोपहर पंचतत्व में विलीन हो गया। सेवक आश्रम रोड स्थित आवास पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, कैबिनेट मंत्री खजानदास व गणेष जोषी, मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन, दायित्वधारी अषोक वर्मा, कांग्रेस के प्रदेष अध्यक्ष गणेष गोदियाल, पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत, मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व विधायक जोत सिंह गुनसोला, राजकुमार, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव समर भंडारी, श्रमिक आंदोलन के नेता एपी अमोली, जगमोहन मेंदीरत्ता, पूर्व जिला पंचायत सदस्य आभा बड़थ्वाल समेत बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं व विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। पुलिस गारद ने पूर्व मंत्री को अंतिम विदाई दी। इसके बाद करीब सवा एक बजे तिरंगे में लिपटे उनके शव की अंतिम यात्रा रिस्पना नदी किनारे नालापानी रोड स्थित श्मषान पहुंची, जहां उनके पुत्र ने चिता को मुखाग्नि दी। यहां हरिद्वार के सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, देहरादून के मेयर सौरभ थपलियाल, डोईवाला नगर पालिकाध्यक्ष नरेंद्र सिंह नेगी, पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल, मसूरी नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष मनमोहन मल्ल, बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष मनमोहन कंडवाल, राजीव शर्मा बंटू, अखिल गढ़वाल सभा के महासचिव गजेंद्र भंडारी, प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना, युवा इंटक के प्रदेष अध्यक्ष पंकज छेत्री, राज्य आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष जगमोहन नेगी, जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकरेती समेत बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।

