पहाड़वासियों की पहुंच से भी दूर हो रहा पहाड़ी लोकजीवन में रचा-बसा ‘काफल’
देहरादून। चटख लाल…मेहरून और कुछ काले-बैंगनी दाने। ठेलों पर इन दानेदार दानों की ढेरियां। आते-जाते लोग ठिठकते हैं। कीमत पूछते हैं। कीमत सुनकर कुछ ही रूकते हैं…बाकी आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी, दोपहर ढलने से पहले ठेलों पर लगी ढेरी साफ हो जाती है। पूरी बिक जाती है। आखिर, इस सुर्ख दानेदार फल का आकर्षण ही कुछ ऐसा है। कोई भी रूके बिना खुद को रोक नहीं पाता। इसकी वजह भी खास है। दरअसल, यह लाल दानेदार फल ‘काफल’ है। ‘काफल’ जो सिर्फ कुछ देर मुंह को स्वाद देने वाला फल भर नहीं है। काफल, पहाड़ के लोकजीवन में गहरे बसा फल है। यह पहाड़वासियों की यादों-उनकी भावनाओं से जुड़ा फल यानी उनके लिए ‘भावनात्मक फल’ है। मगर, साल-दर-साल यह उनकी पहुंच से भी दूर हो रहा है।

हिंसर, काफल, किनगोड़, करोंदे, बेर, च्यूलू, खुबानी जैसे अनेक फल उत्तराखंड के पहाड़ों का अहम हिस्सा हैं। लेकिन, पहाड़ी लोकजीवन और लोक साहित्य में जो स्थान काफल का रहा है, वह किसी अन्य फल का नहीं। यही कारण है कि काफल दिखने या काफल का जिक्र भर आने पर ही पहाड़ों से मैदानों में उतर आए तमाम लोगों के मन में एक हूक सी पैदा हो उठती है, अपने पहाड़ों-अपने पुराने दिनों में खो जाने की। गढ़-कुमौं के पहाड़ों पर एक पक्षी को अक्सर ‘काफल पाको-मैन नि चाखो…’ सरीखी आवाज निकालते सुना जाता है। पक्षी की इस दर्दभरी सी कूक के पीछे यहां एक लोककथा प्रचलित है।

काफल पाको… के पीछे दर्दभरी लोककथा
पहाड़ के एक गांव में अपनी बेटी के साथ एक निर्धन महिला रहती थी। गर्मियों का मौसम था। काफल पकने लगे थे। वह जंगल से काफल तोड़कर लाई। टोकरी भरकर काफल उसने घर में रखे और घास-लकड़ी लाने जंगल चली गई। जाते-जाते छोटी बच्ची को हिदायत दे गई कि काफल अभी मत खाना। शाम को आऊंगी तो खाने को दूंगी। बेटी काफल की टोकरी की निगरानी करने लगी। उसे नींद आ गई। महिला घर लौटी तो टोकरी में काफल काफी कम हो चुके थे। उसे लगा बेटी ने खा लिए। महिला को गुस्सा आया और उसने बच्ची की पिटाई कर दी। बच्ची वहीं दम तोड़ गई। इसबीच, शाम होने पर काफल की टोकरी फिर भर गई। महिला समझ गई कि दिन में तेज गर्मी के कारण मुरझाने से टोकरी में काफल कम हो गए थे। बेटी की मौत से बेहाल महिला अब और बर्दास्त नहीं कर पाई। कुछ ही देर में पश्चाताप में रोते-बिलखते उसने भी दम तोड़ दिया। लोक मान्यता है कि वही बच्ची बाद में पक्षी बनी जो आज भी गांव के आंगनों-जंगलों में अपनी दर्दभरी आवाज में ‘काफल पाको-मिन नि चाखो…’ का एहसास कराती सी लगती है।
लोकगीतों- लोक साहित्य में काफल

पलायन का दंश झेलते पहाड़ के अनगिनत गीतों-लोकगीतों में ‘काफल’ को भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया गया है। उत्तराखंड की पहचान बने लोकगीत, बेडू पाको बारामासा में बेडू के अलावा जिस दूसरे पहाड़ी फल का उल्लेख हुआ है, वह काफल है। ‘बेडू पाको बारामासा…नारेण काफल पाको चैत….मेरी छैला….’ जब भी-जहां कहीं भी गाया-बजाया जाता है, लोक के कदम स्वयं थिरक उठते हैं। हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने अपनी एक लंबी मार्मिक कविता में काफल को कुछ इस तरह याद किया, ‘उसी समय तम के भीतर से मेरे, घर के भीतर आकर लगा गूंजने धीरे-धीरे, एक मधुर परिचित स्वर, काफल पाक्कू, काफल पाक्कू, काफल पाक्क,ू काफल पाक्कू….।’
ठेलों पर बिक रहा 600 रूपये किलो तक
काफल इन दिनों चंबा-मसूरी, श्रीनगर, कोटद्वार, देहरादून, नैनीताल में कई जगह बिकता दिख रहा है। देहरादून में ठेलों पर सजे काफल की कीमत 500 से 600 रूपये प्रति किलो तक है। वहीं, चंबा-धनोल्टी क्षेत्र में यह 400 से 500 रूपये तक बिक रहा है। खासबात यह है कि पिछले डेढ़-दो दशक से काफल बेचने वाले 95 फीसदी ठेले-फेरी वाले बाहरी राज्यों के हैं। यानी, पहाड़वासी अब इस फल को भी अपनी आय का जरिया नहीं बना पा रहा है। काफल बहुत सीमित अवधि का और जल्द खराब होने वाला फल है, इस कारण इसकी उपलब्धता मई के महीने में ही आमतौर पर रहती है और वह भी सिर्फ कुछ दिन।
एक काफल की अनेक विशेषताएं
काफल आमतौर पर जंगली फल है, जिसका पेड़ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत हिमालय के निचले क्षेत्रों में चार हजार से छह हजार फीट तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। काफल का वैज्ञानिक नाम ‘मिरिका एस्कुलंेटा’ है। कई औषधीय गुणों से भरपूर और ठंडी तासीर के चलते यह गर्मियों में शरीर को ठंडक और तरावट पहुंचाता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि, बीपी, शुगर, हार्ट से संबंधित दिक्कतों में भी इसे लाभदायक माना जाता है।

